आजकल हर किसी की जुबान पर एक ही सवाल है – तेल खाना चाहिए या नहीं?
हार्ट अटैक, मोटापा, और तमाम गंभीर बीमारियों की जड़ में तेल को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। डॉक्टर कहते हैं – घी छोड़ो, तेल अपनाओ!
पर क्या यह सच है?
आज हम नाड़ी वैद्य सत्यप्रकाश आर्य जी के मार्गदर्शन में समझेंगे कि तेल हमें कब, कैसे और कितना खाना चाहिए। कौन-सा तेल खाना चाहिए और कौन-सा नहीं?
तेल की परिभाषा – क्या है आयुर्वेद का नजरिया?
“तेलम् तेजं हरति” – यह आयुर्वेद की परिभाषा है।
इसका अर्थ है – तेल हमारे शरीर की तेजस्विता, गर्मी और इम्युनिटी को धीरे-धीरे खत्म कर सकता है। तेल वात नाशक होता है, इसलिए यह उन रोगों में लाभदायक है जहां शरीर में वायु का असंतुलन हो गया हो – जैसे गठिया (arthritis), नसों की जकड़न, शरीर में रूखापन आदि।
तेल का प्रयोग कब करें?
🌧️ वर्षा ऋतु में सबसे उत्तम
वर्षा ऋतु में वातावरण में वायु तत्व की वृद्धि हो जाती है। यह वायु जब शरीर में असंतुलित हो जाती है, तो दर्द, जकड़न, ब्लड सर्कुलेशन की गड़बड़ी जैसे लक्षण उत्पन्न होते हैं।
ऐसे समय में तेल का सेवन और प्रयोग शरीर की वायु को नियंत्रित करने के लिए उत्तम होता है।
कौन-सा तेल खाना चाहिए?
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तिल का तेल – आयुर्वेद में सबसे उत्तम तेल माना गया है। यह शरीर को गर्मी देता है, वात को नष्ट करता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है।
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मूंगफली का तेल – इसका सेवन भी किया जा सकता है। यह मध्यम श्रेणी में आता है और पचने योग्य होता है।
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सरसों का तेल – यह मुख्यतः मालिश के लिए प्रयोग किया जाना चाहिए। हड्डियों, जोड़ों और त्वचा के लिए लाभकारी है।
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बादाम का तेल – इसे नाक में डालने से मानसिक शक्ति और मस्तिष्क को बल मिलता है। आंखों और सर्दी-जुकाम की समस्या में भी लाभ होता है।
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बिनौला तेल (cottonseed oil) – यह मुख्यतः पशुओं के लिए उपयुक्त होता है, मनुष्यों के लिए नहीं।
तेल के नुकसान – क्यों सावधानी जरूरी?
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लगातार 12 महीने तेल खाना शरीर में वात को बहुत ज्यादा घटा देता है, जिससे नसें सिकुड़ने लगती हैं।
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हार्ट, लंग्स, किडनी आदि अंगों में गति रुक जाती है, और व्यक्ति नसों के रोगों से ग्रस्त हो जाता है।
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शरीर में अग्नि (digestive fire) मंद हो जाती है, जिससे पाचन कमजोर होता है।
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मोटापा, ब्लड प्रेशर और हृदय रोग जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
सही तरीका – कब तेल खाएं?
✅ सिर्फ वर्षा ऋतु में खाएं
✅ मात्रा सीमित रखें
✅ सिर्फ तिल या मूंगफली का तेल चुनें
✅ शेष ऋतुओं में घी का प्रयोग करें, क्योंकि घी सर्वोत्तम आहार माना गया है
क्या कहता है आयुर्वेद?
आयुर्वेद मानता है कि घी सबसे श्रेष्ठ होता है। यह वात, पित्त और कफ – तीनों दोषों को संतुलित करता है।
“घी नहीं तो जी नहीं” – यह कहावत यूं ही नहीं बनी।
तेल की अपेक्षा घी शरीर में आसानी से पचता है, नसों को बल देता है, और बुद्धि एवं स्मृति को तेज करता है।
निष्कर्ष – तेल खाएं लेकिन समझदारी से
आज जब हर कोई तेल को एक खलनायक की तरह देख रहा है, उस समय आयुर्वेद हमें संतुलन की बात सिखाता है।
तेल बुरा नहीं है, गलत समय और गलत मात्रा में खाना बुरा है।
तिल का तेल अगर वर्षा ऋतु में सीमित मात्रा में खाया जाए, तो यह शरीर के वात दोष को दूर करता है और रोगों से रक्षा करता है।
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